'क्या बात है! क्या चाहिए?
ताज़ी हवा के झोंकों के बीच यह आवाज सुनकर मैं चौंका। सुबह जल्दी आंख खुलने पर मैं बाग की तरफ निकला था और एक नीम के पेड़ के नीचे खड़ा था।
'क्या मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं?
इस बार आवाज पहले से ज्यादा स्पष्ट थी।
कौन हो सकता है, मैं सोच ही रहा था कि आवाज फिर उभरी- 'मैं नीम हूं। जिसकी छांव में तुम बैठे हो।
'आप... मैं हकबकाया ,, आप बोल सकती हैं? मेरा आश्चर्य प्रश्न में बदला।
'हां क्यों नहीं। लेकिन क्या तुम सुन सकोगे?
'क्यों नहीं मेरे दोनों कान सही-सलामत हैं। मैंने कहा।
'मेरी बात कान से नहीं, दिल से सुनी जा सकती है।
'कहिए, मैं दिल से सुनूंगा। मैंने आश्वासन दिया।
नीम कहने लगी- 'मैंने मनुष्य के लिए क्या नहीं किया? खुद गर्मी झेली लेकिन मनुष्य को पत्तियों की ठंडी छांव में सुलाया। जख्मों पर लेप बनी। सुबह दातुन बनकर मुंह साफ किया। यही नहीं, जिन्होंने मेरी पत्तियों का सेवन किया उनकी काया को रोग-दोष मुक्त रखा। खुद कार्बनडाई आक्साइड पीती रही लेकिन मनुष्य को प्राणदायिनी वायु बांटती रही। मेरी सूखी पत्तियों का धुंआ मछरों को भगाता रहा. मुझसे ज्यादा आक्सीजन देने की क्षमता किसी में नहीं। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने में मैं सदियों से मनुष्य के साथ रही। मेरी पत्तियों को चबाकर पशु पलते रहे। पहले लोग मुझमें शीतला माता का निवास मानकर मेरी पूजा करते थे। त्वचा रोग में मेरी पत्तियों से नहाते थे। बच्चों को मेरे आशीर्वाद के लिए मेरी पत्तियों पर लिटाया जाता था। मैं कितनी खुश होती थी। लेकिन अब.....। नीम का गला भर्राने लगा था।
'अब मनुष्य बेहद क्रूर और स्वार्थी हो गया है। यह भी नहीं सोचता क़ि हम नहीं रहेंगे तो वह कहाँ रहेगा.
मुझे काट डालने पर तुला है। मेरे भाई-बंधु सब काटे जा रहे हैं।
हम तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं और तुम हमें ही .....।
नीम की सिसकियां उभरने लगीं थीं। मैं बेचैनी और ढेर सारे सवालों से घिरने लगा था।
तभी मेरी निगाह घड़ी पर पड़ी।
मैं तुरंत वहां से चल पड़ा।
मुझे कार्यालय पहुंचना था-
ठीक साढ़े दस बजे।

