Tuesday, February 4, 2014

ज्यों भैंसों के दिन फिरे

पुरानी कहावत है कि साल में एक बार घूरे के दिन भी फिरते हैं। उत्तर प्रदेश में इन दिनों भैंसों के दिन फिरे हुए हैं। चर्चा में हैं। तस्वीरें छप रही हैं, वीडियो दिखाए जा रहे हैं। भला हो मंत्री आजम खान साहब का, उन्होंने भैंसों को खबरों में ला दिया है। वैसे खबरों में वे स्वयं रहते हैं लेकिन इस बार उन्होंने भैंसों को आगे कर दिया है। आम तौर पर भैंस की  उपेक्षा ही होती है। लोग दूध उसी का लेते हैं लेकिन गाय के दूध को बेहतर बताते हैं। कम दूध देने के बावजूद लोग गाय को मां कहते हैं जबकि ज्यादा दूध देने के बावजूद भैंस उपेक्षित है, शोषित है। भैंस को बदशक्ल और बेवकूफ का पर्याय बना दिया गया है। यही नहीं, 'अक्ल बड़ी या भैंसÓ कहकर भैंस का मजाक भी उड़ाया जाता है। भैंसों के साथ भेदभाव का आलम यह है कि उनका पानी में जाना भी किसी को अच्छा नहीं लगता। काम बिगडऩे पर 'गई भैंस पानी मेंÓ जैसे मुहावरे इस्तेमाल किए जाते हैं।
 

बहरहाल, कल तक घोर उपेक्षा की शिकार भैंसों को उत्तर प्रदेश में पूरा सम्मान मिला और वह भी सार्वजनिक रूप से। यही नहीं, इन भैंसों की वजह से यूपीपी को भी अपना खोया गौरव हासिल करने का मौका मिला। पुलिस ने जिस तत्पररता व कर्तव्यपरायणता के साथ भैंसों को ढूढ़ निकाला उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। भैंसों को ढूढऩा आसान नहीं होता। क्योंकि सारी भैंसे एक जैसी होती हैं। ऐसे में मंत्रीजी की भैंस कौन सी है, यह पहचान कर पाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर रही होगी लेकिन साहब यह उत्तर प्रदेश की पुलिस है, हिम्मत नहीं हारी और भैंस को ढूढ़ निकाला। बताते हैं कि एसपी रैंक तक के अधिकारियों ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और यह साबित कर दिया कि कानून के हाथ लम्बे होते हैं। भैंसों के गायब होने से नाराज मंत्रीजी ने कुछ पुलिस वालों को लाइन हाजिर कर दिया। अब भैंसों के मिल जाने से जरूर उन्हें खुशी हुई होगी। अभियान दल के पुलिसकर्मियों को अगले साल पुलिस पदक मिल जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
 

जो भी हो, इस घटना से भैंसों का सम्मान जरूर बढ़ गया। उत्तर प्रदेश में जो समाजवाद आया है, उसका लाभ भैंसों तक पहुंच गया है। भैंसें गदगद हैं। इस वक्त अगर भैंसों से पूछा जाए तो उनकी दिली तमन्ना यही होगी कि केन्द्र में अगली सरकार सपा की बने। देखना है,सरकार अपनी इस अनूठी उपलब्धि को मतों में बदल पाती है या नहीं। जैसे भैंसों के दिन फिरे, भगवान करें ऐसे ही सबके दिन फिरें।

Friday, January 10, 2014

सैफई, विकास और सुख की तलाश

कहते हैं, सुख  मनुष्य की शाश्वत खोज है। सुख की खोज ही मनुष्य के विकास का आधार बनी। सुख की खोज में ही उसने मंदिरों का निर्माण किया, संगीत सीखा, गिरि-कंदराओं में ध्यान लगाया, दुनिया जहान की सैर की। बम वर्षक विमानों से लेकर वियाग्रा तक मनुष्य ने जो कुछ बनाया, उसका कारण यही था कि वह निरंतर सुख की तलाश में था। विशेषकर, हमारे देश में सुख की तलाश सदियों से तीव्र गति से हो रही है। यह तलाश रुक गई होती तो दुनियाभर के क्रिकेटरों से लेकर सन्नी लियोन जैसी अभिनेत्रियों तक को रोजगार की तलाश में यहां आने की जरूरत नहीं पड़ती और हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहते।

हमारे देश के विधायक
सुख की तलाश में विदेश गए तो कुछ लोगों के पेट में पता नहीं क्यों, मरोड़ उठ रही है। यह घोर ईष्र्या है। दूसरों की खुशी से पैदा हुई जलन है। आप भी जाइए, किसने रोका है। आदमी अपनी औकात के हिसाब सुख खोजता है। आम लोग देश में ही सुख खोजने के लिए विवश हैं। विधायकों को भी देश में ही सुख खोजना पड़े तो विधायक बनना ही व्यर्थ है। करोड़ों के खर्च के बाद तो आदमी, आदमी से विधायक बनता है। और फिर अब देश में सुख का माहौल ही नहीं रह गया है। बेचारे झांसाराम को लोगों ने गिरफ्तार करवा दिया। कहा जाता है कि कुटिया बना रखी थी जहां खुद भी खुशी  पा रहे थे और दूसरों को भी दिला रहे थे, लेकिन देश की पुलिस को क्या कहें, डंडा लेकर पीछे पड़ गई। गोवा में सपा के एक विधायक के साथ भी यही अपमानजनक व्यवहार हुआ। कुल मिलाकर तीन युवतियों के साथ पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। यह घोर सुख विरोधी माहौल है। आप ही बताइए, सत्ता पाकर भी यदि आदमी सुख नहीं भोगेगा तो सत्ता पाने का फायदा क्या हुआ।

यही वजह है कि अब देश में
सुख खोजने से विधायकों का मोहभंग हो चुका है। वे यहां रिस्क नहीं ले रहे हैं और विदेशों का रुख कर रहे हैं। वैसे भी बताया जाता है कि वहां ज्यादा बेहतर इंतजाम हैं। इतने तरह के मसाज आदि होते हैं कि आदमी को पैदा होने पर गर्व होने लगता है। अपने यहां हजार तरह की झंझट है। कर्नाटक में पहले विधायकों ने विधानसभा सत्र के दौरान मोबाइल पर सुख खोजने की कोशिश की थी, लेकिन कहा जाता है सुख तो ठीक से मिला  नहीं, उलटे लोगों ने हंगामा कर दिया। इसलिए इस बार विधायकों को मजबूर होकर विदेश का रुख करना पड़ा।सुख की ही तलाश में उत्तर प्रदेश के विधायक इन दिनों विदेश में हैं। यहाँ करोड़ों खर्च करके प्रदेश के विकास के लिए दो तरफा इंतजाम किए गए। या तो विदेश जाओ या सैफई। जो जवान हैं, ज्यादा शौकीन हैं और जिन्हें दौर पर दौर की जरूरत पड़ती है,वे दौरे पर हैं बाकी जो उम्रदराज हैं, उनके लिए सैफई महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें माधुरी दीक्षित से लेकर नवोदित तारिकाओं ने ऐसे लटके-झटके दिखाए कि लोगों को सर्दी में गर्मी का एहसास हो गया। गर्मी भी ऐसी पैदा हुई कि बताया जाता है कि मुख्यमंत्री अब खुद माधुरी के साथ पिक्चर देखने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। यहीं नहीं, उन्होंने माधुरी की फिल्म को करोड़ों की छूट भी दे दी। जो खुश होता है वही दूसरों को खुशी दे सकता है। मुख्यमंत्री खुश हैं और चाहते हैं कि माधुरी भी खुश हो जाए। मुख्यमंत्री से लेकर, मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री तक, छोटे-मोटे नेता से लेकर आला अफसर तक सभी ने भरपूर लुत्फ उठाया और मन ही मन जनता जनार्दन को धन्यवाद दिया जिन्होंने वोट देकर यह सुनहरा अवसर दिया।

सुख की खोज को सकारात्मक नजरिये से देखे जाने की जरूरत है।यह खोज वस्तुत: विकास के नए दरवाजे खोलेगी। आखिर जब मंत्री, विधायक खुद खुश नहीं होंगे तो दूसरों की खुशी के बारे में कैसे सोचेंगे। हताश, निराश और कुंठित लोग दूसरों का भला नहीं सोच सकते। वैसे भी यह कोई आम आदमी नहीं, नेता लोग हैं जिनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे के बजाय नेता लोग विदेशों की ओर मुंह कर रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है।
 

 कुछ विघ्न संतोषी लोग मुजफ्फरनगर जैसी बेमजा घटनाओं का जिक्र करके रंग में भंग डालने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सरकार जानती है कि इस देश में जहां लगभग डेढ़ अरब लोग जिंदा हैं वहां 25- 50 लोगों की मौत कौन याद रखेगा। इससे भी ज्यादा भरोसा उसे इस जाति और उस मजहब के लोगों से है जो बरसों से उनके लिए सुख खोजने का पुख्ता इंतजाम करते रहे हैं। 

जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, वह निरंतर विकास कर रहा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बाद यदि कहीं कोई नेताजी पैदा हुए तो सिर्फ उत्तर प्रदेश में। अब आनंद के इस दौरे के बाद निश्चित ही विकास की गति तेज होगी। विदेश के दौरे से लौटने के बाद नेता देश को निराश नहीं करेंगे। खबरों पर नजर रखिए। जल्दी ही विकास की कुछ घटनाएं सुर्खियों में होंगी।

Wednesday, January 1, 2014

नया साल मंगलमय हो

नया साल मंगलमय हो
तन हो स्वस्थ, मन प्रसन्न हो।
घर में भरा धान हो, धन हो।

गूंजे गीत सदा खुशियों के
गीतों में नव सुर, नव लय हो।
नया साल मंगलमय हो।

मेहनत, हंसी, उमंग और आशा।
यही हो जीवन की परिभाषा।
दुर्गम राहों से न डरें हम
मुश्किलों पर सदा विजय हो।
नया साल मंगलमय हो।

Tuesday, December 17, 2013

समलैंगिकता पर सहमति यानी पशुवत जीवन का अधिकार

हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों के हिमायती लोगों की मांगों को अस्वीकार करके कानून की धारा 377 को बहाल कर दिया। अब देश में एक बहस छिड़ गई है कि समलैंगिकता अपराध है या नहीं। बहस इस बात को लेकर भी है कि समलैंगिकता व्यक्तिगत स्वतंत्रता व मानवीय अधिकार है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी ने समलैंगिक संबंधों का समर्थन किया है, जो आश्चर्यजनक नहीं हैं। नैतिकता व मर्यादाओं को तार-तार करने में यह परिवार नेहरू के समय से ही आगे रहा है। उनकी रंगीनमिजाजी और अवैध संबंधों की ढेर सारी कहानियां अतीत के पन्नों पर दर्ज हैं। लेडी माउंटबेटेन  और सरोजनी नायडू की पुत्री पद्मा नायडू से उनके संबंध जग जाहिर रहे। बाद में उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने एक विधर्मी से विवाह किया। राजीव गांधी को भी विदेशी महिला ही भायी।
 

देश में समलैंगिकता को लेकर एक अजीब सा उत्साह देखा जा रहा है। कई गैर सरकारी संगठन हैं जो समलैंगिकों के तथाकथित अधिकारों के लिए सक्रिय हैं। इंनका तर्क है कि समलैंगिकता एक प्राकृतिक जरूरत है, जिसे मान्यता मिलनी चाहिए। वे स्टीव डेविस सहित दुनिया के कई प्रसिध्द समलैंगिकों का हवाला देते हैं और कहते हैं कि इन्हें मानसिक विकृत या बीमार कैसे माना जा सकता है। इनका तर्क यह भी है कि पूरी दुनिया की तरह भारत में भी समलैंगिकों की संख्या बढ़ रही है तो क्यों न इसे भारत में भी कानूनी व सामाजिक मान्यता मिल जाए। मेरा मानना है कि समलैंगिक आकर्षण एक मनोविकार के अलावा कुछ नहीं है और इसका उपचार किया जाना चाहिए। लेकिन यह उपचार तभी संभव होगा, जब समलैंगिक इसे उचित ठहराने के बजाय मानेंगे कि यह गलत है।
 

यह ध्यान रखना होगा कि जिन देशों में समलैंगिक संबंध तेजी से बढ़ रहे हैं वहां एड्स की महामारी भी तेजी से पांव पसार रही है।
 

चिकित्सकों के अनुसार गुदा मैथुन से मलाशय के नाजुक तंतु क्षतिग्रस्त हो जाते हैं जिससे कई कई गम्भीर बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है- जिनमें  एड्स, सिफलिस, एचआईवी इंफेक्शन आदि शामिल हैं।
 

मैंने एक व्यक्ति के बारे में सुना था, जो पशुओं के साथ सेक्स का प्रयास करता था। कल यदि ऐसे ढेर सारे लोग हो जाएं और वे एकजुट होकर इसे सामान्य जरूरत बताने लगें और सामाजिक मान्यता की मांग करने लगें तो क्या होगा।
 

जहां तक पश्चिम का सवाल है, वहां समलैंगिकता की चपेट में नामी-गिरामी खिलाड़ी ही नहीं, राजनेता, साहित्यकार, प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे लोग भी हैं। वहां समलैंगिकता एक फैशन की तरह नहीं पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। यूरोप के अधिकांश देशों में अब समलैंगिक संबंधों को सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। भोग में संतुष्टि की तलाश में लोग एक ऐसी अंधेरी गुफा में उतर चुके हैं , जहां स्त्री  व पुरुष की जननेन्द्रिय  खिलौने के रूप में बेची-खरीदी जा रही है । मनुष्य व पशु के बीच का अंतर मिटाने की होड़ सी चल रही है। कुछ लोग जिनकी संख्या अब लाखों में पहुंच चुकी है, जो पश्चिम की इसी अपसंस्कृति से संस्कारित हुए हैं, चाहते हैं भारत में भी यही सब हो। ऐसे लोग अब अधिकार की बातें करने लगे हैं।
 

ऐसा नहीं कि समलैंगिकता हमारे देश में नहीं थी, समलैंगिकता आदिम युग से है लेकिन किसी भी सभ्य समाज में इसका समर्थन नहीं किया गया, यह सदैव त्याज्य रही।
 

आज देश में समलैंगिकों की संख्या 25 लाख से ऊपर हो चुकी है। कल को ऐसा न हो कि वोट बैंक के चक्कर में कोई पार्टी इनकी संख्या को अल्प मानकर इन्हें बेहतर सुविधाएं देने की घोषणा करने लगे। जिस देश में वोट बैंक के चक्कर में लोग आतंककारियों तक की हिमायत करते नजर आते हैं, वहां ऐसा हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 

यदि हम सभ्य व स्वस्थ समाज के पक्षधर हैं तो समलैंगिकता को बढ़ावा देने की कोशिश का पुरजोर विरोध करना चाहिए। कम से कम भारत जैसे देश में जहां नैतिकता, सदाचार, सुसंस्कार जीवन के आधार हैं, वहां ऐसे सामाजिक अपराधों का कोई स्थान नहीं होना चाहिेए। जो ताकते समलैंगिकता को जीने के अधिकार से जोड़कर देख रही हैं उन्हें सबसे पहले जीना सीखना चाहिए। समलैंगिकता को बढ़ावा देना इस देश की जड़ों को काटने की कोशिश है, इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। समलैंगिकता के आदी हो चुके लोगों पर डंडा बरसाने की नहीं, पूरी करुणा व सहानुभूति के साथ उनके उपचार की जरूरत है।

Monday, December 9, 2013

घर में शेर, दक्षिण अफ्रीका में ढेर

रविवार को दक्षिण अफ्रीका के साथ दूसरे वन डे इंटरनेशनल में 134 रन से हार के साथ ही एक बार फिर यह साबित हो गया कि तेज पिचों पर हमारे बल्लेबाज आज भी नौसीखिए हैं। भारत की सपाट, बल्लेबाजी के अनुकूल पिचों पर रनों का अम्बार लगानेवाले बल्लेबाजों की कलई तेज और उछाल भरी पिचों पर पहले से ही खुलती रही है। ऐसे पिचों पर ज्यादा चपलता, बेहतर फुटवर्क और तकनीकी दक्षता की जरूरत होती है। रविवार का मुकाबला डरबन की पिच पर था जिसे दुनिया की सबसे तेज पिच माना जाता है। यहां भारत लगातार हारता रहा है। वर्ष 92 में 39 रन से, 2006 में 157 रन से, 2011 में 135 रन से भारत हारा था।
साउथ अफ्रीका में इस सीरीज के पहले भारत कुल 25 एक दिवसीय मैचों में से 19 हार चुका है। यह हार तब हुई थी जब शतकों का शतक लगानेवाले भारतरत्न खेला करते थे। एक दिवसीय मैचों के आकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यहां की तेज पिचों पर पहुंचते ही  उनका बल्ला खामोश हो जाता था। जब क्रिकेट के भगवान ही यहां पर पस्त होते रहे हैं तो बाकी खिलाडिय़ों को क्या दोष दिया जाए। 
दक्षिण अफ्रीका में एक दिवसीय मैचों में सचिन का प्रदर्शन खुद इसकी गवाही दे रहा है।       

       
7 dec-1992-                                                       R            B         4        6            SR
Tendulkar b McMillan                                    15            27      1         0        55.55

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9 dec-92
SR Tendulkar c †Richardson b Callaghan      10           36        0        0      27.77
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11 dec-92
 SR Tendulkar c †Richardson b Mathews        22           24        2         0       91.66 

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13    dec-92
     SR Tendulkar     c McMillan b  donald        21           44       1          0       47.72    

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15 dec-92                                                              R            B         4         6        SR
SR Tendulkar     b de Villiers                             32           52        1          0      61.53     

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17 dec-92-durbun
 SR Tendulkar     c Cronje b Pringle                  23           39         0          0       58.97 

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19 dec-92
 SR Tendulkar     c †Richardson b Matthews    21         38         3         0       55.26    

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 23 JAN-97                                                           R           M        B     4     6        SR
 SR Tendulkar     b Pollock                                 0           12         4     0        0     0.00
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2-FEB-97
 SR Tendulkar     b Donald                                  1           14         14     0     0     7.14
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4 FEB-97
     SR Tendulkar     c Cullinan b Klusener         14         34          24     2     0    58.33

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13 FEB-1997
    SR Tendulkar     c Bryson b Cronje                45          48         33     7     1  136.36
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5 OCT 2001
SR Tendulkar     c Gibbs b Kallis                     101        209        129     9     0   78.29
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10 OCT 2001
SR Tendulkar     c Nel b Ntini                           38            82        57     5     0    66.66
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19 OCT-2001

 SR Tendulkar     b Kallis                                  37         68      35      5     0    105.71
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26 OCT- DURBON
SR Tendulkar     b Hayward                               17     49     42     3        0      40.47
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22 nov 2006-durbon
SR Tendulkar     b Nel                                        35     79     51     5     0       68.62
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26 nov-                                                                   R     M    B    4      6         SR
SR Tendulkar     c Bosman b Pollock                  2     20     9     0     0          22.22
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29 nov
SR Tendulkar     c †Boucher b Pollock             1     4     3     0     0             33.33
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3 dec 2006
SR Tendulkar     c de Villiers b Kemp               55     134     97     8     0  56.70
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12 jan 2011 durbon                                               R      M     B     4      6         SR
SR Tendulkar     c Steyn b Tsotsobe                   7       16     11     0     0         63.63
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15 jan 2011
SR Tendulkar     b Botha                                  24    78     44     2     0       54.54
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Saturday, November 23, 2013

सचिन तेंदुलकर या ब्रायन लारा -2


सचिन महलों में जलते हुए दीप थे तो लारा आंधियों के बीच जला चिराग। सचिन अनुकूल परिस्थितियों के शहंशाह थे तो लारा जटिलताओं से भरी विपरीत परिस्थितयों के योध्दा। दोनों महान खिलाडिय़ों में सर्वश्रेष्ठता के बारे में विचार करते हुए हमें दोनों की पृष्ठभूमि पर भी विचार करना होगा। 


लारा ने क्रिकेट खेलना शुरू किया तो महाशक्तिशाली वेस्टइंडीज का मजबूत किला ध्वस्त हो चुका था। महान खिलाड़ी विदा ले चुके थे । कभी जीतने का रिकार्ड बनानेवाली वेस्टइंडीज टीम हारने का रिकार्ड बनाने लगी थी। कई द्वीपों के खिलाडिय़ों को मिलाकर बनने वाली इस टीम में खिलाडिय़ों में मतभेद उभर कर सामने आने लगे थे। वेस्ट इडीज क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बेहद गरीब बोर्ड है जहां पर खेले जानेवाली सीरिज विदेशी  कम्पनियां प्रायोजित करती हैं। जबकि भारत में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है, क्रिकेटरों पर मूसलाधार धन बरसता है। इसे क्रिकेटरों का स्वर्ग कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां सबसे ज्यादा स्टेडियम और करोड़ों क्रिकेटप्रेमी हैं। सबसे ज्यादा क्रिकेट मैच यहां खेले जाते हैं। यहां क्रिकेटर बन जाने का मतलब ही है शोहरत और दौलत के शिखर पर पहुंच जाना। यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी है। जहां पेप्सी, कोकाकोला सहित विभिन्न अनावश्यक उत्पादों को बेचने के लिए कम्पनियां क्रिकेटरों, फिल्म स्टारों को करोड़ों रुपए देती हैं। जबकि वेस्टइंडीज में क्रिकेटरों की हालत दयनीय है। 

वेस्टइंडीज में क्रिकेटरों को बेहतर पैसा देने की मांग को लेकर ब्रायन लारा ने बोर्ड के समझ कुछ मांगे रखी थी जिस पर वेस्ट इंडीज क्रिकेट बोर्ड ने लारा सहित सभी खिलाडिय़ों को टीम से निकाल दिया था। वहां क्रिकेटर सिर्फ खिलाड़ी होता है यहां क्रिकेटर को लोग भगवान बना देते हैं। लारा को टीम का कप्तान बनाया गया था तो टीम के खिलाडिय़ों ने भी इसका विरोध किया था यहां यदि सचिन 138 गेंदों पर शतक बनाते हैं और भारत की हार का कारण बन जाते हैं तो भी कोई विरोध नहीं होता। 

लारा एक बेहद कमजोर टीम से खेले। अक्सर जब वे बल्लेबाजी करने उतरते तो वेस्टइंडीज टीम बेहद कम स्कोर पर दो विकेट गंवाकर संकट में होती। विपक्षी टीम जानती थी यदि लारा को आउट कर लिया तो टीम धराशायी हो जाएगी। ऐसा कई बार हुआ कि लारा के दोहरा शतक या शतक के बावजूद वेस्टइंडीज टेस्ट मैचों में बुरी तरह से हारी। बाकी सारे खिलाड़ी मिलकर भी लारा जितना रन नहीं बना पाते थे। लारा एक ऐसी टीम को जीत का स्वाद चखाते थे जो जीतने के काबिल नहीं थी। सचिन एक ऐसी टीम के साथ खेलते थे जिसका हारना मुश्किल था, जिसमें कई धुरंधर बल्लेबाज थे। सचिन मोहम्मद अजहरुद्दीन, गौतम गम्भीर, वीरेन्द्र सहवाग, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण,सौरव गांगुली जैसे कई महान क्रिकेटरों के साथ खेले।
टेस्ट मैचों की बात करें तो सचिन, द्रविड़ या लक्ष्मण से बेहतर बल्लेबाज नहीं थे। वन डे मैचों में भी वे विराट कोहली से बेहतर बल्लेबाज नहीं थे।
(चित्र espncricinfo से साभार )

Saturday, November 16, 2013

सचिन तेंदुलकर या ब्रायन लारा- 1

आज टेस्ट क्रिकेट से भी सचिन के संन्यास लेने से भारतीय क्रिकेट के एक युग का अंत हो गया। सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए या नहीं, जैसे ढेर सारे सवालों के उठने के बाद आखिर सचिन राजी हुए और उनकी अलविदा सीरिज के लिए वेस्ट इंडीज को बुलाया गया। प्रदर्शन के लिहाज से रसातल में पहुंच चुकी वेस्ट इंडीज टीम प्रतिद्वंद्वी के रूप में बच्चों की टीम साबित हुई और दोनों टेस्ट मैंचों को तीन दिन में ही हार गई और जीत के तोहफे के साथ सचिन की विदाई हुई। यह सीरिज हार-जीत से ज्यादा सचिन की विदाई के लिए आयोजित थी और सचिन को शानदार विदाई दी गई, जिसके वे हकदार भी हैं।

 सचिन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में से एक थे, इसमें दो राय नहीं। रहा सवाल सर्वश्रेष्ठ होने का तो इस पर विवाद होता रहा है। सचिन की तुलना ब्रायन लारा से होती रही है। सचिन या ब्रायन लारा। कौन है दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज। यह सवाल किसी भारतीय से पूछने पर जवाब तय है- सचिन। जिस क्रिकेटर ने 24 साल तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला हो, कुल मिलाकर सौ शतक बनाए हों, जिसका औसत टेस्ट मैचों में 50 से ऊपर हो, वह निश्चित ही महान बल्लेबाज है। टेस्ट मैचों को ही किसी बल्लेबाज की कुशलता की कसौटी माना जाता है। आस्ट्रेलिया के डान ब्रेडमैन को सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माना जाता है। विवाद उनके बाद यानि दूसरे स्थान के लिए होता है।  

टेस्ट मैचों में औसत के हिसाब से लारा सचिन के लगभग बराबर हैं। सचिन का औसत जहां 53 हैं वहीं लारा का औसत 52 है। सचिन ने लारा से लगभग चार हजार रन ज्यादा बनाए हैं लेकिन उन्होंने 68 टेस्ट मैच ज्यादा खेले हैं, जिनमें उन्होंने 96 पारियां खेली हैं। लगभग छह साल पहले रिटायर हो चुके लारा का खेल भारतीय क्रिकेट प्रेमियों ने सचिन की तुलना में कम ही देखा है। इसके अलावा हमारे देश में क्रिकेट जिस भावुकता व भक्तिभाव से देखा जाता रहा है, उसमें सोच-विचार की गुंजाइश कम ही है। जिस देश में मीडिया ने सचिन को क्रिकेट के भगवान के रूप में चर्चित कर रखा हो, वहां उनसे बेहतर किसी को मानने के लिए कौन तैयार होगा। यही कारण है कि कोई भी क्रिकेटर जब लारा को बेहतर बताता है तो चर्चा शुरू हो जाती है और लोग ऐसी बातों को गलत साबित करने में जुट जाते हैं। 

लारा और सचिन एक दूसरे के प्रशंसक हैं और स्वयं लारा सचिन को बेहतर मानते हैं। यह इन दोनों खिलाडिय़ों की महानता है। यह अलग बात है कि विजडन ने टेस्ट क्रिकेट की 100 सर्वश्रेष्ठ पारियों में सचिन की एक भी पारी को शामिल नहीं किया जिसकी सचिन के भारतीय प्रशंसकों व भारतीय मीडिया ने भारी आलोचना की। इस पर विजडन का जवाब यह था कि जीत दिलाने वाली या जीत में अहम भूमिका निभानेवाली पारियों को ज्यादा महत्व मिला और सचिन की ज्यादातर अच्छी पारियां या तो ड्रा मैच में आई हैं या हारे हुए मैच में। रहा सवाल लारा का, तो उन्हें दूसरा स्थान मिला। आस्ट्रेलिया के खिलाफ बारबाडोस में चौथी पारी में उन्होंने 309 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए 153 नाबाद की पारी खेलकर वेस्टइंडीज को जीत दिलाई थी। इसमें आठ विकेट गिरने के बाद एम्ब्रोस व वाल्श के साथ बनाए गए 62 रन शामिल हैं। लारा के सामने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज ग्लेन मैकग्राथ थे और उन्होंने उस टेस्ट मैच में 44 ओवर फेंके थे। सचिन या लारा की सर्वश्रेष्ठता की तुलना करते समय सचिन की आस्ट्रेलिया में खेली गई पारियों की मिसाल दी जाती है। यहां भी लारा सचिन से बेहतर दिखाई देते हैं। लारा ने आस्ट्रेलिया में 277, 226, 182, 132 रन की पारी खेली जबकि सचिन ने 241, 154, 153,148, 114,116 रन की सर्वश्रेष्ठ पारियां खेली हैं। यहां देखना होगा कि लारा ने दो दोहरे शतक बनाए हैं जबकि सचिन ने दो शतक ज्यादा लगाया है। यह ध्यान रखना होगा कि सचिन ने 68 टेस्ट ज्यादा खेले हैं। 

लारा ने टेस्ट मैचों में एक बार 375 व एक बार 400 रन बनाया है जबकि भारत में बल्लेबाजी के अनुकूल फ्लैट पिचों पर खेलने के बावजूद सचिन का टेस्ट मैचों में उच्चतम स्कोर बांग्लादेश के खिलाफ 248 ही रहा और इस दिग्गज बल्लेबाज की पूजा करने वाले भक्तों को इस बात का मलाल ही रह गया कि सचिन के नाम एक भी तिहरा शतक दर्ज नहीं हो सका। 

बहरहाल, टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेनेवाले सचिन की प्रतिभा, क्रिकेट और अपने लक्ष्य प्रति उनके अतुलनीय समर्पण को सलाम है।  आज ही सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा हुई है। सचिन को बधाई लेकिन ध्यानचंद जैसे कई महान खिलाडियों ने क्या बिगाड़ा था। 
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