Monday, October 24, 2011

उजास ही उजास हो

सुख- समृध्दि, शांति, सौहार्द के दीप जलें
                     हर दिशा में फैला उजास ही उजास हो.
आँखों में उम्मीद और दिलों में मोहब्बत पले
                    सभी कि वाणी में गीत-ग़ज़ल सी मिठास हो.
सुन्दर, सुखद, शुभ फलदायी हो वर्तमान
                उज्ज्वल भविष्य का भी हमें विश्वाश हो
सिर्फ अपनी ही चाह, तो भटकाएगी राह
              दूसरों की ख़ुशी में भी ख़ुशी का एहसास हो.


ब्लॉगर मित्रों सहित सभी को दीपोत्सव की शुभकामनायें.

Friday, October 21, 2011

मेट्रो रेल का स्वागत.

विकास की बुलंदियों को छू रहे बेंगलुरु के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है. तमाम विवादों, विरोधों और परीक्षणों से गुजरने के बाद  लगभग 1,540 करोड़ की लागत से आख़िरकार मेट्रो रेल पटरी पर दौड़ी.इसके साथ ही बेंगलुरु अत्याधुनिक परिवहन व्यस्था वाला देश का तीसरा महानगर बन गया. यह एक संयोग ही है की मेट्रो रेल सबसे पहले उन महानगरों में चल रही है जो  सर्वधर्म समभाव व् बहुरंगी संस्कृति के पोषक हैं. ·कोलकाता व् दिल्ली की तरह बेंगलुरु में भी पूरे देश की सांस्कृतिक विविधता के दर्शन होते हैं. यही इसके बेजोड़ विकास का कारण भी है. जहाँ तक बेंगलुरु की परिवहन व्यवस्था का सवाल है, वर्ष 1940 में बेंगलुरु ट्रांसपोर्ट कंपनी की स्थापना के साथ ही सार्वजनिक यातायात व्यवस्था की शुरुआत हुई थी, लगभग 98 सरकारी बसें सड़कों पर दौड़ी थी. लगभग 71 साल बाद परिवहन व्यस्था में व्यापक बदलाव हो रहा है.परिवहन विकास की धुरी है.अधिकांश सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ क्योंकि वहां आवागमन के साधन सुलभ थे. आधुनिक समय में भी आधारभूत ढांचा ही विकास की मुख्य शर्त है.
  नम्मा मेट्रो का जोरदार स्वागत स्वाभाविक है. यह भारी यातायात से कराहते शहर  के लिए उम्मीद लेकर आई है.स्वागत है नम्मा मेट्रो.

Wednesday, October 12, 2011

जग जीत गए जगजीत

जगजीत सिंह जग को जीत कर चले गए.कल से ही सोच रहा हूँ कैसे श्रध्दासुमन अर्पित करूं. नहीं करूँगा तो एक अपराधबोध रहेगा क़ि मुझसे इतना भी न हुआ.पहली बार किसी धारावाहिक  में उनका गीत सुना था, हम तो हैं परदेश में, देश में निकला होगा चाँद. डॉ राही मासूम राजा के गीत को जगजीत ने इस अंदाज़ में गाया क़ि, लगा जैसे विरह वेदना को जुबान मिल गई. पहली बार जब टेप रिकॉर्डर खरीद  रहा था तो इस बात क़ि ख़ुशी थी क़ि अब जगजीत के कैसेट खरीद सकूँगा.कई बार उनकी कैसेट खरीदना खाना खाने से ज्यादा जरूरी लगा.उस दौर में और भी कई ग़ज़ल गाने वाले थे लेकिन जगजीत उनसे अलग ही नहीं, ऊपर भी थे. संघर्ष के दिनों में बाज़ार के सामने झुके लेकिन शोहरत क़ी  बुलंदी पर पहुँचने के बाद बाज़ार क़ी फिक्र ही नहीं क़ी. शराब और शबाब के दायरे से ग़ज़ल गायकी को बाहर निकाला. नए वाद्यों का प्रयोग किया. सारंगी, हारमोनियम की जगह वायलिन और गिटार का प्रयोग हुआ तो ग़ज़ल मुस्कुरा उठी. सबसे बड़ी बात, जगजीत ने ग़ज़ल को आम आदमी की दिन चर्या से जोड़ा. ग़ज़ल उसके उल्लास की गवाह बनी तो सपनों और संघर्ष की साथी भी.अब मैं राशन क़ी कतारों  में नज़र आता हूँ. अपने खेतों से बिछड़ने क़ी सजा पाता हूँ. जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है, दो आँखों में एक से रोना एक से हँसना है. मिली हवाओं में उड़ने क़ी वो सजा यारों कि मैं जमीन के रिश्तों से कट गया यारों, वो रुलाकर हंस न पाया देर तक, जब मैं रोकर मुस्कुराया देर तक, जाने कितनी  गज़लें हैं जो उन्होंने बाज़ार को ठेंगे पर रखकर गायीं. माँ  सुनाओ मुझे वो कहानी, जिसमे राजा न हो, न हो रानी.जैसी गजलों को संगीतबध्द  करते हुए जगजीत बाज़ार को उसकी औकात बता रहे थे. उनकी ग़ज़लों में आम आदमी का दर्द, उसकी ज़द्दोज़हद, उसकी जिद और जूनून को अभिव्यक्ति मिलती थी.यही कारण है कि जगजीत को सुनना अपने भीतर उतरना, खुद से रूबरू होने जैसा था. जवान बेटे की मौत के बाद उनकी आवाज़ की कशिश जैसे और बढ़ गई. मुश्किलें इतनी पड़ी हमपे की आसां हो गई गा ही नहीं रहे थे, जी रहे थे. हजारों ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल जैसे जगजीत की आवाज़ के लिए बेक़रार थी. गज़ल का हर लफ्ज़ जगजीत की आवाज में उतरकर अपनी रूह से मिल जाता था या यूँ कहें की उनकी गायकी का स्पर्श पाकर ग़ज़ल वैसे ही सज जाती थी जैसे सिन्दूर पाकर कोई सुहागिन. 
जगजीत के जाने से ग़ज़ल वैसे ही अकेली हो गई है जैसे भरे मेले में वह हाथ छोड़ जाये जो उसे मेले में लाया था. 


ऊपर एक ग़ज़ल का लिंक दिया गया है, सुनें, ग़ज़ल सचमुच दिल को छू  लेगी.
(चित्र desirulez.net व विडियो u tube से साभार)

Tuesday, September 20, 2011

हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है

इन दिनों पूरे देश में हिंदी को लेकर जबरदस्त उत्साह है. अख़बार हिंदी के गुणगान और महत्व से भरे पड़े हैं. हिंदी के महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डाला जा रहा है. लाखों का बजट है.  कार्यालयों में हिंदी समारोहों की धूम है. अतिथि बुलाये जा रहे हैं, लिफाफे थमाए जा रहे हैं. स्वागत हो रहा है. भाषणों का दौर है.फूल मालाएं हैं,  तालियाँ हैं. गर्दने उचक रही हैं, कैमरे चमक रहे है. कबीर प्रासंगिक हो गए हैं, तुलसी भी याद किये जा रहे हैं. हिंदी उत्सव की धारा बह रही है, लोग हाथ धो रहे हैं और अघा जाने के बाद मुंह भी. हर कोई गदगद है. मंत्री से लेकर संतरी तक, कौन है जो खुश नहीं है. हिंदी की झोली में सभी के लिए उसकी हैसियत के हिसाब से खुशियाँ हैं. बड़े अफसर लाखों कूट रहे हैं, छोटे- मोटे अधिकारी थोड़े-बहुत में ही मुंह चौड़ा कर रहे हैं. हिंदी नए-नए रूप धारण कर घर पहुँच रही है, चेहरे की लालिमा बढ़ा रही है. हिंदी पिज्जा बन रही है, गहनों व साड़ियों के रूप में ढल रही है. शाम को हिंदी छलकने और खनकने लगती है. हिंदी शुरूर बनकर छा जाती है. हिंदी की जयजयकार है. हिंदी की कृपा से सभी लोग खुश हैं. हिंदी से जुड़े लोग व्यस्त है. रोज कहीं न कहीं अतिथि बन रहे हैं. जो नहीं बने हैं, जुगाड़ में लगे हैं. भाषणों में हिंदी के प्रति लगाव देखते और सुनते ही बनता है. गजब का जोश है ऐसा लगता है कि हिंदी का किसी भी वक्त कल्याण हो सकता है. आश्चर्य है, इसके बावजूद कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी का समुचित प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा. जा क़ी रही भावना जैसी हिंदी को तिन देखि तैसी. कुछ घोर निराशवादी लोग कह रहे हैं कि हिंदी के आयोजनों में नया कुछ भी नहीं है, यह तो हर साल होता है. दरअसल, हिंदी को लेकर सशंकित वही हैं, जिन्हें कहीं बुलाया नहीं जा रहा है. ढेर सरे लोग ऐसे हैं जो पहले हिंदी की दशा-दुर्दशा पर विगलित हो जाते थे, लेकिन जब पूछ होने लगी, तो उन्हें हिंदी के भविष्य की चिंताए निर्मूल  लगने लगीं. हिंदी के मंच पर सम्मान आदि मिलते ही आशंकाए वैसे ही उड़ गयीं जैसे सूरज के निकलते ही कुहासा गायब हो जाता है.
आखिर जिसके लिए करोड़ों खर्च हो रहे हो उसकी दशा ठीक न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? कायदे से तो हिंदी को इतना बड़ा बजट देखकर ही किसी रूपगर्विता की भांति इतराना चाहिए और खुश हो जाना चाहिए. आखिर अब और क्या और क्यों चाहिए? कवियों ने भारत माँ के माथे की बिंदी तक कह दिया.  अमरीका जैसे देशों में हिंदी सम्मलेन होने लगे. नयी पीढ़ी भी हिंदी को आवर नेशनल लान्ग्वेज मानती ही है. फिर भी लोगबाग हिंदी के भविष्य को लेकर खामखाह चिंतित हो रहे हैं. जगह-जगह चल रहे हिंदी समारोहों को गौर से देखिये, हिंदी का भविष्य उज्ज्वल नजर आने लगेगा.

Friday, August 12, 2011

सावन जा रहा है


सावन जा रहा है, रुआंसा सा। बदले वक्त में इसकी  उपेक्षा ही नहीं, तिरस्कार  भी होने लगा है। कहां तो प्रतीक्षा होती थी, जोरदार स्वागत होता था। अब सावन आता है, चला जाता है, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। 
सावन सभी के लिए अलग-अलग अर्थ लेकर  आता है। यही वह समय है, जब साधू-संत एक स्थान पर ठहरकर  भौतिक  सुखों के  प्रति संयम का  संदेश देते हैं। त्योहारों की  श्रृंखला शुरू होती है, नई उमंग का  संचार होता है। वसुंधरा तृप्त व हरीभरी हो जाती है। कोपलें फूटती है, हरियाली की  चादर बिछ जाती है और नदियां उफन पड़ती हैं। सावन की  बूंदें तन-मन में ऐसी पुलक   जगा देती हैं कि प्रिय के  बिना सबकुछ फीका, अधूरा व रसहीन लगने लगता है। बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है तो आरजुओं को  जैसे पंख लग जाते हैं। तभी तो प्रियतमा ताने देकर कहती  है कि  तेरी दो टकिया दी नौकरी में मेरा लाखों का  सावन जा रहा है। सावन ही वह महीना है, जिसमें जियरा वैसे झूमता है, जैसे बन  में मोर। भारतीय संस्कृति कि  यह विशेषता तो देखिए कि जो माह प्रेम के  लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त माना जाता है, उसी माह में संयम व सदाचार का संदेश भी गुंजायमान होता है। दरअसल, प्रेम क़ी आतुरता और मचलते अरमानों पर यदि संयम का अंकुश न हो तो कैसा प्रेम? फिर तो प्रेम क्षुद्र तक  ही सीमित रह जाएगा। 
साहित्यकारों को  सबसे ज्यादा आंदोलित, प्रेरित करने वाला माह है, सावन। कभी  यह किसी क़ी  जुल्फों में नजर आता है तो कभी  कजरारे नैनों में और हां कभी-कभी किसी के नैना भी सावन-भादों बन जाते हैं। 
 बदलते वक्त में सावन क़ी  पहचान दांव पर लगी है क्योंकि अब न तो सावन के  झूले हैं और न ही कजरी। धान रोपती महिलाओं का गीत तो जैसे अब बीते जमाने क़ी  बात हो गई। 
हमरी भीगी जाए रेशम क़ी सारी पिया, बोय जिनि कुवारी (धान) पिया ना, झमक़ी झुक़ी आई बदरिया कारी, झूला झूलें  नन्दकिशोर, धीरे-धीरे पऊंवा धरईं बारी धनिया गोड़े घुघुरवा बाजे ना, रुमझुम बरसे बादरवा, मस्त हवाएं आईं पिया घर आजा, आजा पिया घर आजा। जाने कितने  गीत हैं जिनका सावन से अटूट नाता था, जो झूलों क़ी  पेग के  साथ कानों में रस और जीवन में उल्लास घोलते थे।इनके बिना सावन बरसता नहीं, बे-रसता है.

Thursday, June 9, 2011

हम कहाँ जा रहे हैं

झुण्ड से बिछड़े दो हाथियों ने 8 जून को मैसूर में एक आदमी को रौंद कर मारा डाला और चार लोगों को घायल कर दिया. गुस्साए हाथियों ने पालतू पशुओं पर भी हमला किया और खूंटे से बंधी एक गाय को मार डाला.इस  दौरान शहर के विभिन्न इलाकों में घन्टों भगदड मची रही. घंटों की मशक्कत के बाद बेहोशी का इंजेक्शन देकर हाथियों पर काबू पाया जा सका.
प्रत्यक्षदर्शियों और वन विभाग के आधिकारियों के अनुसार रास्ता भटककर शहर आ गए हाथी बदहवासी में इधर-उधर भाग रहे थे और बाहर निकलने का रास्ता तलाश कर रहे थे. सोच रहे होंगे कि यह कहाँ आ गए हम जहाँ बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं है. कंक्रीट के जंगल में उन्हें रास्ता नहीं मिला तो आपा खो बैठे.
यह महज एक खबर नहीं. यह कोई नई बात भी नहीं.आहार की तलाश में जंगली जानवरों का रिहायशी इलाकों में घुस आना और पशुओं तथा इंसानों पर हमला करना अब आम बात है. इस पर हमें परेशान क्यों होना चाहिए.आखिर यही सब तो हम करते रहे हैं, आदिकाल से. सभ्यता  के तमाम दावों के बावजूद न तो भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक हुआ और न ही ख़ाल खींच लेने की आदिम हिंसा से ऊपर उठ पाए.
 घटते  वन क्षेत्र और वहां भी आदमी की बढती दखलंदाज़ी से जंगली जानवरों का जीना मुश्किल हो गया है. लेकिन चूँकि अभिव्यक्ति के माध्यमों और मीडिया तक जंगल में रह रहे जानवरों क़ी पहुँच नहीं है, लिहाजा वहां मनुष्य के आतंक क़ी बहुत ज्यादा ख़बरें नहीं आ पातीं. मेरे अपने गाँव से गोरैया विदा हो चुकी है, अटरिया पे कागा अब नहीं बोलता और मरे जानवरों क़ी सफाई करनेवाले गिध्द भी अब गायब हैं. हमने ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग किया कि चिड़िया बेमौत मारी गई, जानवरों को ऐसे इंजेक्शन दिए कि साफ करनेवाले गिध्द खुद साफ़ हो गए.

  • बढ़ती आबादी और विकास की आवश्यकताओं की पूर्ति की खातिर जंगलों के सफाये से जैव विविधता को भंयकर खतरा उत्पन्न हो गया है। जानवरों, जीव जंतुओं का अस्तित्व खतरे में है। यही कारण है कि जंगल में भगदड़ मची हुई है और आदमी और जंगली जानवरों के बीच टकराव बढ़ रहा है.यह तो तय है कि जानवर अब हमें नहीं मिटा सकते लेकिन यह भी सच है कि जानवरों को मिटाकर हम खुद को नहीं बचा सकते. दूसरों के अस्तित्व को मिटाकर खुद के बचे और बने रहने का भ्रम कब टूटेगा? रिहायशी इलाकों में पहुंचकर जानवरों को  जरुर अपनी गलती का एहसास होता है और वे सोचते हैं कि कहाँ आ गए लेकिन हम यह कब सोचेगे कि हम कहाँ जा रहे हैं.जब फिर कोई जानवर शहर में घुसकर उत्पात मचाएगा? वैसे  भी, उत्पात के लिए अब हम जानवरों पर निर्भर नहीं.

Thursday, May 26, 2011

आशा, सपने और यथार्थ

  लम्बे समय के बाद ब्लॉग के लिए कुछ लिखने बैठा हूँ. वह भी आज इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि रात दफ्तर में ही गुज़र रही है. अन्यथा, देर रात घर पहुंचने और सुबह देर से जागने के बाद इतनी ऊर्जा ही कहाँ बचती है कि कुछ ऐसा किया जाये जो जरुरत नहीं, ख़ुशी के लिए हो.मुझे लगता है कि लगभग 40 साल तक आप सपनो को हकीकत में बदलने के लिए पूरी आशा और विश्वाश से जुटे रहते हैं, उसके बाद आशा पर यथार्थ हावी होने लगता है.सपने, इच्छाएं आपको संघर्ष की ओर तब भी ले जाते हैं लेकिन अब आप तेरे फूलों से भी प्यार तेरे काँटों से भी प्यार जैसे समभाव के साथ मैदान में उतरते हैं.आपको क्रोध आता है तो आपकी मजबूरियां सामने खड़ी हो जाती हैं, आपको थकान लगती है तो बच्चों का चेहरा सामने होता है.ऐसे में रोने की स्थिति बनने पर एक खिसियाई सी मुस्कान आपके चेहरे पर होती है और ख़ुशी आये तो आपकी आँखों से टपकने लगती है.आप न जीभर रो पाते है, न खुलकर हंस पाते है,जिंदगी आपको  एक अभिनेता बना देती है जिसका अपना कोई वजूद नहीं, उसे एक पात्र को जीना है,जो वह नहीं है.
दरअसल, यह उम्र का वह दौर है जब आदर्श, सच्चाई, इंसानियत जैसे शब्दों से आपका मोहभंग होने लगता है. आप देखते हैं कि आपके आस-पास जो दुनिया है, वहां ऐसे शब्दों का कोई वजूद नहीं.जो  होना चाहिए और जो है उसके बीच का अंतर आपको निराश करता है और भाग्यवादी बनाता है.
आपका क्या ख्याल है?